प्रकृति का बेटा
गाँव का नाम था सुखपुर। चारों तरफ़ हरियाली, बीच में एक पुराना पीपल और उसकी छाँव में बैठा रहता था बारह साल का लड़का, नाम था उसका वीरू। लोग उसे पागल कहते थे क्योंकि वह पेड़ों से बातें करता था। सुबह-सुबह उठता, पीपल के तने से लिपट जाता और फुसफुसाता, “आज कितने पंछी आए तुम्हारे पास?”
एक साल सूखा पड़ा। नदी सूख गई, कुएँ खाली हो गए। गाँव वाले शहर भागने की सोचने लगे। उसी समय गाँव में आया एक बड़ा ठेकेदार। उसने कहा, “इस जंगल को काट दो, यहाँ फैक्ट्री लगेगी। सबको नौकरी मिलेगी।”
पंचायत में हामी भर दी गई। अगले दिन बुलडोज़र आने वाले थे।
रात को वीरू पीपल के पास बैठा रो रहा था। अचानक उसे लगा जैसे पीपल ने उसका कंधा थपथपाया हो। हवा नहीं थी, फिर भी पत्तियाँ हिल रही थीं। वीरू ने कान लगाया। उसे एक बूढ़ी-सी आवाज़ सुनाई दी, “बीज हैं न तेरे पास?”
वीरू के पास सचमुच बीज थे। साल भर से वह हर फल खाता और गुठली इकट्ठी करता था। नीम, आम, जामुन, शीशम,
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